जंगल जंगल ढूँढ रहा है,
मृग अपनी कस्तूरी..
कितना मुश्किल है तय करना,
खुद से खुद की दूरी..
भीतर शून्य..
बाहर शून्य..
शून्य चारो ओर..
मैं नहीं हूं मुझमें
फिर भी "मैं मैं" का ही शोर.. !!
सच है यह, है ना !!
जाने अनजाने ही सही, जो सच दिल की गहराइयों में दबा पड़ा था आज मन की तरंगों से हो के होंठों तक और होंठों से हाथों में कलम थामे कागज़ पर उतर ही आया ।।
सच है उस कस्तुरी मृग की तरह ही मैं भी न जाने कहां कहां ढूंढ़ रही थी अपने अस्तित्व को, अपनी पहचान को, अपने अंतर आत्मा की आवाज को, मेरे ईश्वर को ।। हैरान, परेशान, बेहाल हो जब थक गई और शांत बैठी तो ध्यान से अंदर झांक के देखा तो जो में ढूंढ रही थी वो तो मुझमें ही था, न जाने कबसे ...
उस शून्य अवस्था में जाना और माना भी कि, बाहरी शोरोगुल से दूर हटकर अपने अंदर झांकना ही ईश्वरप्राप्ती की वो कस्तुरी है जिसे हम बाहरी दुनिया में ढूंढ रहे हैं और यही जीवन की संपूर्णता है ।।
@creatorprachi
Very nice
ReplyDeleteThank you ☺️
DeleteWow.. great..
ReplyDeleteमैं नहीं हु मुझमें
फिर भी "मैं मैं" का ही शोर.. !!
Excellent line...
Keep it up..
Your guidance and appreciation encourage me to write more .. Thank you ☺️💗☺️
Deleteबहुत सुंदर, ऐसे ही हम को प्रेरणा देते रहें
ReplyDeleteThank you ☺️
ReplyDeleteIt's your love and encouragement, keep me motivated ..
अप्रतिम.. अंतिम सत्य... खूपच छान
ReplyDeleteVery Beautiful Lines....😘
ReplyDeleteThank you 🧚🏻♀️
DeleteLoL 💗🧚🏻♀️💗😘
DeleteI love you, you are just awesome ❤️❤️ very beautifully written
ReplyDeleteThank you .. It's God's Gift .. n thank you for your love n appreciation ..
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